Thursday, April 23, 2020

Mata Shikari Devi Temple Mandi

Mata Shikari Devi Temple Mandi

Mata Shikari Devi

||Mata Shikari Devi||Mata Shikari Devi Temple Mandi||

Mata Shikari Devi
Mata Shikari Devi



हिमाचल के मंडी जिले की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित मां शिकारी देवी अपने मंदिर में छत सहन नहीं करती है। माता शिकारी देवी खुले आसमान के नीचे विराजमान रहने में खुश रहती हैं। बारिश हो, आंधी हो, तूफान हो, मां खुले आसमान के नीचे रहना ही पसंद करती हैं। रोचक पहलू तो यह है कि माता की पिंडियों पर कभी भी बर्फ नहीं टिकती है।
              11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित माता शिकारी देवी मंदिर हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है। शिकारी देवी मंदिर परिसर में चौसठ योगनियों का वास है जो सर्व शक्तिमान है। मंडी जनपद में शिकारी देवी को सबसे शक्तिशाली माना जाता है।
                                                                      देवी के दरबार में प्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु देवी के दरबार शीश नवाने दूर दूर से पहुंचते हैं। शिकारी देवी मंदिर और शिकारी धार की मनोरम वादियां पर्यटकों और श्रद्धालुओं को खूब लुभाती है। बर्फबारी में माता शिकारी देवी में कड़ाके की ठंड पड़ने से देवी के मंदिर के कपाट करीब तीन माह के लिए बंद हो जाते हैं।
                                                                     जिससे माता तीन माह बर्फ में कैद रहती है। बर्फबारी में माता के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं और पर्यटकों पर प्रशासन प्रतिबंध लगाता है। मगर, माता के अनेक भक्त बर्फबारी में देवी से आशीर्वाद लेने के लिए शिकारी देवी में बर्फ में भी पहुंच जाते हैं।


                                                                              मंडी जिला के बड़ा देव कमरूनाग अगर रूठ जाएं तो वे अपने मूल मंदिर से निकल जाते हैं और माता शिकारी देवी के मंदिर में विराजमान हो जाते हैं। देवता के कारदारों और गूरों को देव कमरूनाग को बड़ी मुश्किल से शिकारी देवी मंदिर से मनाकर लाना पड़ता है।
                                                                                                                अब तक हजारों बार देव कमरूनाग रूठने पर माता शिकारी देवी के मंदिर में छिप चुके हैं। जब साजे के दिन देव कमरूनाग के मंदिर में कलया नहीं खपती है तो तब देवता के कारदारों को पता चलता है कि देव कमरूनाग मंदिर में नहीं है।
फिर शिकारी देवी मंदिर में जाकर विधि विधान से देव कमरूनाग को मनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है और देवता को मूल मंदिर में लाया जाता है।

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