Articles by "gk"

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization Complete topic

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization



सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization

सिंधु घाटी सभ्यता  विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी।

इस सभ्यता का उदय सिंधु नदी की घाटी में होने के कारण इसे सिंधु सभ्यता तथा इसके प्रथम उत्खनित एवं विकसित केन्द्र हड़प्पा के नाम पर हड़प्पा सभ्यता, आद्यैतिहासिक कालीन होने के कारण आद्यैतिहासिक भारतीय और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है।

सभ्यता का खोज(सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization):-


इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय 'रायबहादुर दयाराम साहनी' को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक 'सर जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में 'श्री राखल दास बनर्जी' के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के 'लरकाना' ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला।

सभ्यता का विस्तार(सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization):-


अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के भागों में पाये जा चुके हैं। इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में 'जम्मू' के 'मांदा' से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने 'भगतराव' तक और पश्चिमी में 'मकरान' समुद्र तट पर 'सुत्कागेनडोर' से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ तक है। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल 'सुत्कागेनडोर', पूर्वी पुरास्थल 'आलमगीर', उत्तरी पुरास्थल 'मांडा' तथा दक्षिणी पुरास्थल 'दायमाबाद' है। लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन मिस्र या 'सुमेरियन सभ्यता' से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization के मुख्य स्थल:-



  • हड़प्पा:-
                             हड़प्पा 6000-2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। मोहनजोदड़ो, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में हड़प्पा में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। इसकी खोज 1920 में की गई। वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। सन् 1857 में लाहौर मुल्तान रेलमार्ग बनाने में हड़प्पा नगर की ईटों का इस्तेमाल किया गया जिससे इसे बहुत नुक़सान पहुँचा।
  • मोहन जोदड़ो:-
                                    जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। हड़प्पा, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में मोहन जोदड़ो में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।
  • चिन्धड़ों:-
                          मोहनजोदाड़ो के दक्षिण में स्थित चिन्धड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में 'एन.गोपाल मजूमदार' ने किया तथा 1943 ई. में 'मैके' द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से 'सैंधव संस्कृति' के साक्ष्य मिलते हैं।




  • लोथल :-


                 यह गुजरात के अहमदाबाद ज़िले में 'भोगावा नदी' के किनारे 'सरगवाला' नामक ग्राम के समीप स्थित है। खुदाई 1954-55 ई. में 'रंगनाथ राव' के नेतृत्व में की गई
  • रोपड़:-

                     पंजाब प्रदेश के 'रोपड़ ज़िले' में सतलुज नदी के बांए तट पर स्थित है। यहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम उत्खनन किया गया था। इसका आधुनिक नाम 'रूप नगर' था। 1950 में इसकी खोज 'बी.बी.लाल' ने की थी।


  • कालीबंगा 


                                        यह स्थल राजस्थान के गंगानगर ज़िले में घग्घर नदी के बाएं तट पर स्थित है। खुदाई 1953 में 'बी.बी. लाल' एवं 'बी. के. थापड़' द्वारा करायी गयी। यहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं।


  • सुरकोटदा :-


                            यह स्थल गुजरात के कच्छ ज़िले में स्थित है। इसकी खोज 1964 में 'जगपति जोशी' ने की थी इस स्थल से 'सिंधु सभ्यता के पतन' के अवशेष परिलक्षित होते हैं।


  • आलमगीरपुर :-


पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में यमुना की सहायक हिण्डन नदी पर स्थित इस पुरास्थल की खोज 1958 में 'यज्ञ दत्त शर्मा' द्वारा की गयी।


  • रंगपुर :-


गुजरात के काठियावाड़ प्राय:द्वीप में भादर नदी के समीप स्थित इस स्थल की खुदाई 1953-54 में 'ए. रंगनाथ राव' द्वारा की गई। यहाँ पर पूर्व हडप्पा कालीन सस्कृति के अवशेष मिले हैं। यहाँ मिले कच्ची ईटों के दुर्ग, नालियां, मृदभांड, बांट, पत्थर के फलक आदि महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ धान की भूसी के ढेर मिले हैं। यहाँ उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं।


  • बणवाली :-


हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवषेश मिले हैं। हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई. में 'रवीन्द्र सिंह विष्ट' के नेतृत्व में की गयी।

ड़प्पाकालीन सभ्यता से सम्बन्धित कुछ नवीन क्षेत्र(सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization):-


  • अल्लाहदीनों (अरब महासागर) 
  • खर्वी (अहमदाबाद) 
  • कुनुतासी (गुजरात) 
  • बालाकोट (बलूचिस्तान) 
  • भगवानपुरा (हरियाणा) 

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization की नगर निर्माण योजना:-


इस सभ्यता की सबसे विशेष बात थी यहां की विकसित नगर निर्माण योजना। इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थलों के नगर निर्माण में समरूपता थी। नगरों के भवनो के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे।
नगर निर्माण एवं भवन निर्माण :- सभी प्रमुख नगर जिनमे हड़प्पा मोहन जोदड़ो, चन्हुदड़ो, लोथल तथा कालीबंगा सभी प्रमुख नगर नदियों के तट पर बसे थे इन नगरों में सुरक्षा के लिये चारो ओर परकोटा दीवार का निर्माण कराया जाता था । प्रत्येक नगर में चौड़ी एवं लम्बी सड़के थी, चौड़ी सड़के एक दूसरें शहरों को जोड़ती थी । सिन्धु घाटी सभ्यता में कच्चे पक्के, छोटे बड़े सभी प्रकार के भवनों के अवशेष मिले है । भवन निर्माण में सिन्धु सभ्यता के लोग दक्ष थे । इसकी जानकारी प्राप्त भवनावशेषों से होती है । इनके द्वारा निर्मित मकानो में सुख-सुविधा की पूर्ण व्यवस्था थी । भवनों का निर्माण भी सुनियोजित ढंग से किया जाता था । प्रकाश व्यवस्था के लिये रोशनदान एवं खिड़कियां भी बनार्इ जाती थी । रसोर्इ घर, स्नानगृह, आंगन एवं भवन कर्इ मंजिल के होते थे । दीवार र्इटो से बनार्इ जाती थी । भवनो, घरों में कुंये भी बनाये जाते थे । लोथल में र्इटो से बना एक हौज मिला है ।

विशाल स्नानागार :- मोहन जादे ड़ो में उत्खनन से एक विशाल स्नानागार मिला जो अत्यन्त भव्य है । स्नानकुण्ड से बाहर जल निकासी की उत्तम व्यवस्था थी । समय-समय पर जलाशय की सफार्इ की जाती थी । स्नानागार के निर्माण के लिये उच्च कोटि की सामग्री का प्रयोग किया गया था, इस कारण आज भी 5000 वर्ष बीत जाने के बाद उसका अस्तित्व विद्यमान है ।
अन्न भण्डार :- हड़प्पा नगर के उत्खनन में यहां के किले के राजमार्ग में दानेो ओर 6-6 की पक्तियॉं वाले अन्न भण्डार के अवशेष मिले है, अन्न भण्डार की लम्बार्इ 18 मीटर व चौड़ार्इ 7 मीटर थी । इसका मुख्य द्वार नदी की ओर खुलता था, ऐसा लगता था कि जलमार्ग से अन्न लाकर यहां एकत्रित किया जाता था । सम्भवत: उस समय इस प्रकार के विशाल अन्न भण्डार ही राजकीय कोषागार के मुख्य रूप थे ।
जल निकास प्रणाली :- सिन्धु घाटी की जल निकास की याजे ना अत्यधिक उच्च कोटि की थी । नगर में नालियों का जाल बिछा हुआ था सड़क और गलियों के दोनो ओर र्इटो की पक्की नालियॉ बनी हुर्इ थी । मकानों की नालियॉं सड़को या गलियों की नालियों से मिल जाती थी । नालियों को र्इटो और पत्थरों से ढकने की भी व्यवस्था थी । इन्हें साफ करने स्थान-स्थान पर गड्ढ़े या नलकूप बने हुये थे । इस मलकूपों में कूडा करकट जमा हो जाता था और नालियों का प्रवाह अवरूद्ध नहीं होता था । नालियों के मोडो और संगम पर र्इटो का प्रयोग होता था ।
सड़कें :- सिंधु सभ्यता में सड़कों का जाल नगर को कई भागों में विभाजित करता था। सड़कें पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण की ओर जाती हुई एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। मोहनजोदाड़ो में पाये गये मुख्य मार्गो की चौड़ाई लगभग 9.15 मीटर एवं गलियां क़रीब 3 मीटर चौड़ी होती थी। सड़को का निर्माण मिट्टी से किया गया था। सड़को के दोनो ओर नालियों का निर्माण पक्की ईटों द्वारा किया गया था और इन नालियों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर ‘मानुस मोखे‘बनाये गये थे। नलियों के जल निकास का इतना उत्तम प्रबन्घ किसी अन्य समकालीन सभ्यता में नहीं मिलता ।


सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization का सामाजिक जीवन -


हड़प्पा जैसी विकसित सभ्यता एक मजबतू कृषि ढांचे पर ही पनप सकती थी । हड़प्पा के किसान नगर की दीवारों के समीप नदी के पास मैदानों में रहते थे । यह शिल्पकारों, व्यापारियों और अन्य शहर में रहने वालों के लिए अतिरिक्त अन्न पैदा करते थे । कृषि के अलावा ये लोग बहुत सी अन्य कलाओं में भी विशेष रूप से निपुण थे । घरों के आकारों में भिन्नता को देखते हुए कुछ विद्वानों का मत है कि हड़प्पा समाज वर्गो में बंटा था ।
भोजन :- हड़प्पा संस्कृति के लागे भोजन के रूप में गेहॅूं, चावल, तिल, मटर आदि का उपयोग करते थे । लोग मांसाहारी भी थे । विभिन्न जानवरों का शिकार कर रखते थे । फलो का प्रयोग भी करते थे । खुदार्इ से बहुत सारे ऐसे बर्तन मिले है, जिनसे आकार एवं प्रकार से खाद्य व पेय सामग्रियों की विविधता का पता लगता है । पीसने के लिये चक्की का प्रयोग करते थे ।
वस्त्र :- सिन्धु घाटी के निवासियों की वेष भूषा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि महिलायें घाघरा साड़ी एवं पुरूष धोती एवं पगड़ी का प्रयोग करते थे । स्वयं हाथ से धागा बुनकर वस्त्र बनाते थे।
आभूषण एवं सौदर्य प्र्साधन :- स्त्री, पुरूष दोनो आभूषण धारण करते थे । आभषूणों में हार कंगन, अंगूठी, कर्णफूल, भुजबन्ध, हंसली, कडे, करधनी, पायजेब आदि विशेष उल्लेखनीय है । कर्इ लड़ी वाली करधनी और हार भी मिले है । आभूषण सोने, चॉदी, पीतल, तांबा, हाथी दांत, हड्डियों और पक्की मिट्टी के बने होते है । अमीर बहुमूल्य धातुओं और जवाहरातों के आभूषण धारण करते थे । स्त्री पुरूष दोनो श्रृंगार प्रेमी थे धातु एवं हाथी दांत की कंघी एवं आइना का प्रयोग करते थे । केश विन्यास उत्तम प्रकार का था खुदार्इ से काजल लगाने की एवं होठों को रंगने के अनेक छोटे-छोटे पात्र मिले हैं ।
मनोरंजन :- सिन्धु सभ्यता के लोग मनोरजं न के लिये विविध कलाओं का प्रयोग करते थे जानवरों की दौड़ शतरंज खेलते थे, नृत्यगंना की मूर्ति हमें हड़प्पा संस्कृति में नाच गाने के प्रचलन को बताती है । मिट्टी एवं पत्थर के पांसे मिले है ।
प्रौद्योगिकी ज्ञान :- सिन्धु सभ्यता के लोगों का भवन निर्माण, विशाल अन्न भण्डार जल निकासी व्यवस्था, सड़क व्यवस्था देखकर उनकी तकनीकी ज्ञान बहुत रहा होगा, ऐसा अनुमान लगाया जाता है, वे मिश्रित धातु बनाना जानते थे, उनकी मूर्तियॉं एवं आभूषण बहुत खुबसूरत थे।
मृतक कर्म :- इस काल में भी शवों के जमीन में दफनाया जाता था । शवों के साथ पुरा पाषाण काल के समान भोजन, हथियार, गृह-पात्र तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ भी साथ में रख दी जाती थी । मृतकों की कब्रों के ऊपर बड़े-बड़े पत्थर भी रख दिये जाते थे, जिनको रखने का मुख्य उद्देश्य मृतकों को सम्मान देना था । कुछ स्थलों पर शवो को जलाने की प्रथा का भी प्रचलन हो गया था । जब शव जल जाता था तो उसकी राख को मिट्टी के बने घड़ों में रखकर सम्मान के साथ जमीन में गाड़ दिया जाता था ।


चिकित्सा विज्ञान :- सिन्धु सभ्यता के निवासी विभिन्न औषधियों से परिचित थे, तथा हिरण, बारहसिंघे के सीगों, नीम की पत्तीयों एवे शिलाजीत का औषधियों की तरह प्रयोग करते थे, उल्लेखनीय है कि सिन्धु सभ्यता में खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के उदाहरण भी काली, बंगा एवं लोथल से प्राप्त होते है । समुद्र फेन (झाग) भी औषधि के रूप में प्रयोग में लाया जाता था।

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization का आर्थिक जीवन:-

कृषि एवं पशुपालन :- आज के मुकाबले सिन्धु प्रदेश पूर्व में बहुत उपजाऊ था। सिन्धु की उर्वरता का एक कारण सिन्धु नदी से प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ भी थी। गाँव की रक्षा के लिए खड़ी पकी ईंट की दीवार इंगित करती है बाढ़ हर साल आती थी। यहां के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवंबर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ और जौ की फ़सल काट लेते थे। यहाँ कोई फावड़ा या फाल तो नहीं मिला है लेकिन कालीबंगां की प्राक्-हड़प्पा सभ्यता के जो कूँट (हलरेखा) मिले हैं उनसे आभास होता है कि राजस्थान में इस काल में हल जोते जाते थे।
सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग गेंहू, जौ, राई, मटर, ज्वार आदि अनाज पैदा करते थे। वे दो किस्म की गेँहू पैदा करते थे। बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है। इसके अलावा वे तिल और सरसों भी उपजाते थे। सबसे पहले कपास भी यहीं पैदा की गई। इसी के नाम पर यूनान के लोग इस सिन्डन (Sindon) कहने लगे। हड़प्पा योंतो एक कृषि प्रधान संस्कृति थी पर यहां के लोग पशुपालन भी करते थे। बैल-गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर पाला जाता था। हड़प्पाई लोगों को हाथी तथा गैंडे का ज्ञान था।
व्यापार :- यहां के लोग आपस में पत्थर, धातु शल्क (हड्डी) आदि का व्यापार करते थे। एक बड़े भूभाग में ढेर सारी सील (मृन्मुद्रा), एकरूप लिपि और मानकीकृत माप तौल के प्रमाण मिले हैं। वे चक्के से परिचित थे और संभवतः आजकल के इक्के (रथ) जैसा कोई वाहन प्रयोग करते थे। ये अफ़ग़ानिस्तान और ईरान (फ़ारस) से व्यापार करते थे। उन्होंने उत्तरी अफ़गानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश स्थापित किया जिससे उन्हें व्यापार में सहूलियत होती थी। बहुत सी हड़प्पाई सील मेसोपोटामिया में मिली हैं जिनसे लगता है कि मेसोपोटामिया से भी उनका व्यापार सम्बंध था। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापार के प्रमाण मिले हैं साथ ही दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्रों का भी उल्लेख मिलता है - दलमुन और माकन। दिलमुन की पहचान शायद फ़ारस की खाड़ी के बहरीन के की जा सकती है।
उद्योग-धंधे :- यहाँ के नगरों में अनेक व्यवसाय-धन्धे प्रचलित थे। मिट्टी के बर्तन बनाने में ये लोग बहुत कुशल थे। मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग से भिन्न-भिन्न प्रकार के चित्र बनाये जाते थे। कपड़ा बनाने का व्यवसाय उन्नत अवस्था में था। उसका विदेशों में भी निर्यात होता था। जौहरी का काम भी उन्नत अवस्था में था। मनके और ताबीज बनाने का कार्य भी लोकप्रिय था,अभी तक लोहे की कोई वस्तु नहीं मिली है। अतः सिद्ध होता है कि इन्हें लोहे का ज्ञान नहीं था।


कला का विकास

मूर्तिकला या प्रतिमाएं :- हडप़्पा सभ्यता के लोग धातु की सुन्दर प्रतिमाएं बनाते थे । इनका सबसे सुन्दर नमूना कांसे की बनी एक नर्तकी की मूर्ति है । खुदार्इ में सेलखड़ी की बनी एक दाढ़ी वाले पुरूष की एक अर्ध प्रतिमा प्राप्त हुर्इ है । उस के बांये कन्धे से दांये हाथ के नीचे तक एक अलंकृत दुशाला और माथे पर सरबन्ध है । पत्थर की बनी हुर्इ दो पुरूषों की प्रतिमाए हड़प्पा की लघु मूर्तिकला का उदाहरण है ।
चित्रकला :- अनेक बर्तनों तथा मोहरो पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि सिन्धु घाटी के लोग चित्रकला में अत्यधिक प्रवीण थे । मुहरो पर सांडो और भैंसो की सर्वाधिक कलापूर्ण ढंग से चित्रकारी की गर्इ है । वृक्षों के भी चित्र बनाये गये है ।
धातु कला :- सिन्धु सभ्यता की कलाओं में धातु कला जिसमें विशेष स्वर्ण कला का उल्लेख मिलता है । यहां के सोनारों द्वारा गलार्इ, ढलार्इ, नक्कासी जोड़ने आदि का कार्य किया जाता था । सिन्धु काल की कलाकृतियां इतनी विलक्षण और मनोहर है कि ऐसी कारीगरी पर आज का सुनार भी गर्व कर सकता है ।
मुद्रा कला :- हड़प्पा की खुदार्इ में विभिन्न प्रकार की मुद्रायें मिली है ये मुद्रायें वर्गाकार आकृति की है जिन पर एक ओर पशुओं के चित्र बने है तथा दूसरी ओर लेख है । ये हांथी दांत व मिट्टी के लगभग 3600 मुहरे प्राप्त हुर्इ है ।
धातु कला :- सिन्धु सभ्यता की कलाओं में धातु कला जिसमें विशेष स्वर्ण कला का उल्लेख मिलता है । यहां के सोनारों द्वारा गलार्इ, ढलार्इ, नक्कासी जोड़ने आदि का कार्य किया जाता था । सिन्धु काल की कलाकृतियां इतनी विलक्षण और मनोहर है कि ऐसी कारीगरी पर आज का सुनार भी गर्व कर सकता है ।
पात्र निर्माण कला :- खुदार्इ में अनेक ताम्र एवं मिट्टी के पात्र मिले है जो बहुत सुन्दर एवं उच्च कोटि के है यह वर्गाकार, आयताकार, गोलाकार में मिले है । ये पानी भरने एवं अनाज रखने के काम आते थे ।
ताम्र्रपात्र निर्माण कला :- खुदार्इ में अनेक ताबें के पात्र मिले है ये वर्गाकार, आयताकार में है जिसमें चित्रकारी है ।
वस्त्र निर्माण कला :- सिन्धु सभ्यता की खुदार्इ की गइर् तो तकलियॉ प्राप्त हुर्इ है जिनसे सूत कातने के काम में भी यहां के निवासी निपुण थे ।
नृत्य तथा संगीत कला :- इस बात के भी प्रमाण हैं कि सिन्धुवासी नृत्य तथा संगीत से परिचित थे । पहले हम कांसे की बनी एक नर्तकी की मूर्ति का उल्लेख कर आये है । इससे स्पष्ट है कि सिन्धु प्रदेश में नृत्य कला का प्रचार था । इस मूर्ति की भावभंगिमा वैसी ही हृदयग्राही है जैसी कि ऐतिहासिक युग की मूर्तियों में देखने को मिलती है । बर्तनों पर कुछ ऐसे चित्र मिले हैं जो ढोल और तबले से मिलते-जुलते हैं । अनुमान है कि सिन्धुवासी वाद्ययन्त्र भी बनाना जानते थे ।
लिपि या लेखन कला :- मेसोपोटामिया के निवासियों की तरह हड़प्पा वासियों ने भी लेखन कला का विकास किया । यद्यपि इस लिपि के पहले नमूने 1853 में प्राप्त हुये थे पर अभी तक विद्वान इसका अर्थ नहीं निकाल पाए हैं । कुछ विद्वानों ने तो इसे पढ़ने के लिए कम्प्यूटर का भी उपयोग किया पर वह भी असफल हैं । इस लिपि का द्रविड़, संस्कृत या सुमेर की भाषाओं से संबंध स्थापित करने के प्रयत्नों का भी कोर्इ संतोषजनक परिणाम नहीं निकला है । हड़प्पा की लिपि को चित्र लिपि माना जाता है । इस लिपि में हर अक्षर एक चित्र के रूप में किसी ध्वनी, विचार या वस्तु का प्रतीक होता है । लगभग 400 ऐसे चित्रलेख देखने में आये हैं। यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है अत: हम हड़प्पा संस्कृति के साहित्य, विचारों या शासन व्यवस्था के विषय में अधिक नहीं कह सकते हैं । पढ़ना व लिखना शायद एक वर्ग तक सीमित था ।

सिंधु घाटी सभ्यता/Indus Valley Civilization का धार्मिक जीवन


हड़प्पा के लोग एक ईश्वरीय शक्ति में विश्वास करते थे




  • शिव की पूजा :- मोहनजोदड़ों से मैके को एक मुहर प्राप्त हुई जिस पर अंकित देवता को मार्शल ने शिव का आदि रुप माना आज भी हमारे धर्म में शिव की सर्वाधिक महत्ता है। मातृ देवी की पूजा:- सैन्धव संस्कृति से सर्वाधिक संख्या में नारी मृण्य मूर्तियां मिलने से मातृ देवी की पूजा का पता चलता है। यहाँ के लोग मातृ देवी की पूजा पृथ्वी की उर्वरा शक्ति के रूप में करते थे (हड़प्पा से प्राप्त मुहर के आधार
  • मूर्ति पूजा :- हड़प्पा संस्कृति के समय से मूर्ति पूजा प्रारम्भ हो गई हड़प्पा से कुछ लिंग आकृतियां प्राप्त हुई है इसी प्रकार कुछ दक्षिण की मूर्तियों में धुयें के निशान बने हुए हैं जिसके आधार पर यहाँ मूर्ति पूजा का अनुमान लगाया जाता है। हड़प्पा काल के बाद उत्तर वैदिक युग में मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है हलाँकि मूर्ति पूजा गुप्त काल से प्रचलित हुई जब पहली बार मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ।
  • जल पूजा :- मोहनजोदड़ों से प्राप्त स्नानागार के आधार पर।
  • सूर्य पूजा :- मोहनजोदड़ों से प्राप्त स्वास्तिक प्रतीकों के आधार पर। स्वास्तिक प्रतीक का सम्बन्ध सूर्य पूजा से लगाया जाता है।
  • नाग पूजा: मुहरों पर नागों के अंकन के आधार पर।
  • वृक्ष पूजा:- मुहरों पर कई तरह के वृक्षों जैसे-पीपल, केला, नीम आदि का अंकन मिलता है। इससे इनके धार्मिक महत्ता का पता चलता है।

Social Media(Stay Updated With Us):


My GOV  PORTAL लांच करने वाला हिमाचल 11 वा राज्य 



माई जीओवी पोर्टल लांच करने वाला हिमाचल देश का 11वां राज्य बन गया है। इससे पहले नागालैंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, अरूणचल प्रदेश, मणिपुर, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश और असम सरकार पोर्टल लांच कर चुकी है।


            माई जीओवी पोर्टल पर एक क्लिक करते ही जयराम सरकार की 45 योजनाएं आम जनाता देख सकेगी। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने यह पोर्टल उनके जन्मदिन के अवसर पर छह जनवरी को ही लांच किया था। उसके बाद सरकार ने आम जनमानस से सुझाव भी मांगे थे, ताकि जनता जिस तरह पोर्टल चाहती है, उसे सुचारू रूप से चलाया जाए। आईटी विभाग के मुताबिक चार दिन में 151 सुझाव आए हैं। ऐसे ही सुझाव 17 जनवरी तक मांगे हैं। लोगों के इन सुझावों की समीक्षा होगी और उसके बाद जनता जैसी योजनाएं चाहेगी, उसी अंदाज में पोर्टल पर काम चलेगा। माईजीओवी हिमाचल प्रदेश के लोगों को अपने विचारों, सुझावों, प्रतिक्रियाओं और शिकायतों को सरकार तक पहुंचाने के लिए तैयार किया गया। बताया गया कि माईजीओवी हिमाचल पोर्टल और मुख्यमंत्री ऐप के माध्यम से प्रशासन को लोगों के करीब लाने का एक प्रयास है और इससे सरकार और लोगों के मध्य परस्पर संवाद सुनिश्चित किया जा सकता है। इस पोर्टल की मुख्य विशेषताएं विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक नीतियों के मुद्दों पर बातचीत, चर्चा, कार्य, मत देना और ब्लॉग्स हैं। इसकी मदद से नागरिक सरकार द्वारा जनता के कल्याण के लिए विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों की प्रत्यक्ष और त्वरित जानकारी हासिल कर सकेंगे। इस ऐप के माध्यम से आम जनता भी नीतियों और कार्यक्रमों को अधिक प्रभावशाली और परिणाम उन्मुख बनाने के लिए अपने मूल्यवान सुझाव दे सकते हैं। इससे पूर्व प्रदेश सरकार ने जनता को उनकी समस्याओं के समाधान और सामाजिक महत्त्व के विभिन्न मुद्दे उठाने के लिए मुख्यमंत्री संकल्प सेवा हेल्पलाइन-1100 का शुभारंभ किया था। माईजीओवी पोर्टल पर मुख्यमंत्री को किसी भी विकास कार्य एवं योजनाओं में संशोधन करने के लिए सुझाव दे सकते हैं। उसके बाद ही प्रदेश सरकार 17 जनवरी के बाद सभी सुझावों की समीक्षा कर उसे संपूर्ण दस्तावेज बनाएगी।



Lakes In Himachal Pradesh

Lakes In Himachal Pradesh

Lakes In Himachal Pradesh  |Lakes In Himachal Pradesh in hindi ” 

यह   पोस्ट  हिमाचल प्रदेश  गवर्नमेंट एक्साम्स के लिए बहुत ही उपयोगी है ।HPSSSB,HPSSC,HPPSC,PATWARI,POLICE,HP-TET.HP-TGT,JBT प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण पोस्ट  ।HIMEXAM.COM  का उदेश्य आपको महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर  उपलब्ध कराना है । तो चलिए  Lakes In Himachal Pradesh के बारे में विस्तार से जानते हैं । Lakes In Himachal Pradesh | Lakes In Himachal Pradesh in Hindi

More:-

Lakes In Himachal Pradesh


 


1॰ बनावटी झीलें (कृत्रिम झीलें)-


(i) गोविंद सागर झील:- गोविंद सागर हिमाचल की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है। यह झील बिलासपुर जिले में सतलुज नदी पर बनी है। इस जिल की लम्बाई 88 मीटर है। इस जिल का क्षेत्रफल 168 वर्ग किमी॰ है।
(ii) पौंग झील:- यह झील कांगड़ा जिले में हैं। यह झील व्यास नदी पर बनी हुयी है। इसकी लम्बाई 42 किमी॰ है। इस झील के पास पौंग डैम भी है, जो 1960 में बना था। इस झील को महाराणा प्रताप सागर के नाम से जाना जाता है।
(iii) पंडोह झील:- यह झील मंडी के ब्यास नदी पर बनाई गयी है। इसकी लम्बाई 14 किमी॰ है और यह राष्ट्रीय राजमार्ग 21 के किनारे है।

Click Here for 

2॰ हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक झीलें :-


(i) चम्बा -
(क) गड़ासरू झील - 1 किमी. परिधि, ऊँचाई - 3505 मी. (चुराह तहसील में देवी कोठी के पास स्थित है |)
(ख) खजियार झील - 0.5 किमी. लंबी, ऊँचाई 1951 मी. |
खजियार को हिमाचल प्रदेश का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है | इसे यह नाम पी. ब्लेजर ने 7 जुलाई, 1992 को दिया | यह विश्व का 160 वां स्थान है, जिसे मिनी स्विटजरलैंड का दर्जा दिया गया है | यह स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न से 6194 किमी. दूर है |
(ग) लामा झील - इस झील की ऊँचाई - 3962 मी. है | यह सात झीलों का समूह है | (भरमौर उपमंडल में स्थित है |)
(घ) मणिमहेश झील - इस झील की ऊँचाई - 3950 मी. है | यह कैलाश पर्वत के नीचे स्थित है |
(ड़) चमेरा झील - (कृत्रिम झील है, जो रावी नदी के पानी से बनी है |)
(च) महाकाली झील - इस झील की ऊँचाई - 3657 मी. है | यह झील देवी काली को समर्पित है | (चुराह तहसील के खुंडी में चांजू पंचायत में स्थित है |)
(ii) काँगड़ा -

(क) डल झील - इस झील की ऊँचाई - 1775 मीटर है | यह धर्मशाला से 11 किमी. दूर है |
(ख) करेरी झील - इस झील की ऊँचाई - 1810 मीटर है |

(iii) मण्डी -

(क) कुमारवाह झील - इस झील की ऊँचाई - 3150 मी. है |
(ख) पराशर झील - इस झील की ऊँचाई - 2743 मी. है |
(ग) रिवालसर झील - इस झील को बौद्ध लोग पद्माचन भी कहते हैं | बौद्ध भिक्षु पद्मसम्भव के जन्म दिन पर यहाँ छेच्शु मेला लगता है | यह झील हिन्दू, सिख व बौद्ध तीनों धर्मों के लोगों का तीर्थ स्थान है | इसे तैरते हुए टापुओं की झील भी कहते हैं |
(घ) कुन्त भयोग
(ड़) सुखसागर झील
(च) कामरुनाग
(छ) कालासर झील



(iv) कुल्लू -

(क) मनतलाई झील (पार्वती नदी का उद्गम स्थल)
(ख) भृगु
(ग) दशहर (रोहतांग दर्रे के समीप)
(घ) स्त्रयुल
(ड़) सरवालसर (बंजार उपमंडल में स्थित है )

(v) लाहौल-स्पीती -

(क) सूरजताल झील - इस झील की ऊँचाई 4800 मीटर है | भागा नदी का उद्गम स्थान बारालाचा दर्रे के समीप यह झील स्थित है |
(ख) चंद्रताल झील - इस झील की ऊँचाई 4270 मीटर है | (इसे लोहित्य सरोवर के नाम से भी जाना जाता है |)
(ग) ढंखर झील

(vi) शिमला -

(क) चन्द्रनाहान झील - ऊँचाई - 4267 मी. (रोहडू, शिमला में स्थित) पब्बर नदी का उद्गम स्थल स्थान |
(ख) तानु जुब्बल झील (नारकंडा)
(ग) गढ़ कुफर
(घ) कराली झील
(ड़) बरादोनसर झील

(vii) किन्नौर -

(क) नाको झील - इस झील की ऊँचाई 3662 मी. है |
(ख) सोरंग झील



(viii) सिरमौर -

(क) रेणुका झील - यह हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़ी प्राकृतिक झील है, जो 2.5 किमी. लंबी है | इसकी आकृति सोई हुई स्त्री जैसी है | रेणुका भगवान परशुराम (विष्णु के छठे अवतार) की माता है | रेणुका को अपने पुत्र परशुराम के हाथों बलिदान होना पड़ा, जिसने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुआ ऐसा किया | जमदग्नि जामलू देवता के रूप में भी जाने जाते थे |
(ख) सुकेती झील

Social Media(Stay Updated With Us):



                                                              Advertisement With Us  

Dhami Goli Kand Complete Information in Hindi/English

धामी गोली कांड - 

धामी गोली कांड/Dhami Goli Kand


16 जुलाई, 1939 में धामी गोली कांड हुआ | 13 जुलाई, 1939 ई. को शिमला हिल स्टेट्स हिमालय रियासती प्रजामण्डलके नेता भागमल सौठा की अध्यक्षता में धामी रियासतों के स्वयंसेवक की बैठक हुई | इस बैठक में धामी प्रेम प्रचारिणी सभा पर लगाई गई पाबंदी को हटाने का अनुरोध किया, जिसे धामी के राणा ने मना कर दिया | 16 जुलाई, 1939 में भागमल सौठा के नेतृत्व में लोग धामी के लिए रवाना हुए | भागमल सौठा को घणाहट्टी में गिरफ्तार कर लिया गया | राणा ने हलोग चौक के पास इकटठी जनता पर घबराकर गोली चलाने की आज्ञा दे दी जिसमें 2 व्यक्ति मारे गए व कई घायल हो गए |



Click Here for 

Dhami Goli Kand:-


On 16 July 1939, the Dhami Goli scandal took place. On July 13, 1939, a meeting of the Dhami princely swayamsevaks was held under the chairmanship of Bhagmal Southa, the leader of the Shimla Hill States Himalayan princely state. In this meeting, Dhami requested to remove the ban imposed on Prem Pracharini Sabha, which Dhami's Rana refused.On 16 July 1939, under the leadership of Bhagmal Southa, people left for Dhami. Bhagmal Southa was arrested in Ghanahatti. Rana ordered to shoot at the gathering people near Halog Chowk, in a panic, in which two persons were killed and many were injured.



Social Media(Stay Updated With Us):


                                                              Advertisement With Us      

Most Important Questions HP Gk -Temples

Most Important Questions Himachal Pradesh Gk-Temples



Most Important Questions HP Gk -Temples  |Most Important Questions HP Gk -Temples in hindi ” 

यह   प्रश्न-उत्तर हिमाचल प्रदेश  गवर्नमेंट एक्साम्स के लिए बहुत ही उपयोगी है ।HPSSSB,HPSSC,HPPSC,PATWARI,POLICE,HP-TET.HP-TGT,JBT प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर ।HIMEXAM.COM  का उदेश्य आपको महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर  उपलब्ध कराना है । तो चलिए  Most Important Questions HP Gk -Temples के बारे में विस्तार से जानते हैं । Most Important Questions HP Gk -Temples | Most Important Questions HP Gk -Temples in Hindi

More:-


Q_1.  किस मन्दिर का कारदार ठाकुर और पुजारी लामा होता है
Ans.  त्रिलोकीनाथ


Q_2.  मनु का प्राचीनतम मन्दिर कहाँ स्थित है
Ans.  मनाली 


Q_3.  चम्बा का लक्ष्मी नारायण मन्दिर किसने बनवाया था
Ans.  साहिल वर्मन


Q_4.  किस स्थान पे प्राचीन रॉक क्त मन्दिर स्थित है
Ans.  मसरूर 


Q_5.  प्रसिद्ध सूर्य मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  निरथ


Q_6.  भीमकाली मन्दिर  कहाँ स्थित है
Ans.  सराहन 


Q_7.  सुजानपुर टीहरा में प्रसिद्ध गौरी शंकर मन्दिर का निर्माण किसने करवाया था
Ans.  संसार चंद


Q_8.  उदयपुर का प्रसिद्ध मृकुला देवी मंदिर किस सामग्री सी बना है
Ans.  लकड़ी से 


Q_9.  रंगनाथ मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  पुराना बिलासपुर 


Q_10.  लक्ष्मी नारायण मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  चम्बा 



Click Here for 

Q_11.  कामाक्षा मन्दिर_____में बना हुआ है
Ans.   पैगोडा शैली 


Q_12.  चौरासी मंदिरो के समूह के लिए कौन सा मंदिर प्रशिद्ध है
Ans.  भरमौर 


Q_13.  शिकारी देवी मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  मंडी 


Q_14.  काँगड़ा जिले का ज्वालामुखी मन्दिर किस वास्तुशैली से बना है
Ans.  गुम्बद शैली 


Q_15.  कामाक्षा मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  करसोग 


Q_16.  किस क्षेत्र में पांडव भीम की पत्नी हिडिम्बा व् उनके पुत्र घटोत्कच के मन्दिर बने हुए है
Ans.  कुल्लू घाटी 


Q_17.  मणिमहेश पर्यटन स्थल कहाँ स्थित है
Ans.  चम्बा 

Q_18.  दियोत्सिध्द मंदिर कहाँ स्थित है 
Ans.  हमीरपुर


Q_19.  सिरमौर का बाला सुन्दरी मन्दिर कहाँ स्थित है
Ans.  त्रिलोकपुर 


Q_20.  हिडिम्बा देवी किस शैली  में निर्मित है
Ans.   पैगोडा शैली


Q_21.  अवलोकितेश्वर मन्दिर है
Ans.  लाहौल स्पिति 


Q_22.  चिंतपूर्णी मन्दिर का आधिकतर भाग किस जिले में है
Ans.  उना  



Q_23.  चण्डीगढ़ के नजदीक मंशा देवी मन्दिर ____स्टेट के पूर्वकालीन प्रदेश में था
Ans.  सिरमौर 


Q_24.  हाटकोटी मन्दिर कहाँ स्थित है
Ans.  शिमला 


Q_25.  ब्रेजेश्वरी मन्दिर जिसे महमूद गजनवी की सेना ने नष्ट किया था कहाँ स्थित है
Ans.  काँगड़ा 


Q_26.  13वीं शताब्दी में निर्मित बैजनाथ मंदिर का 19वीं शताब्दी में किस शासक ने जीर्णोधार किया था
Ans.  राजा संसार चंद 

Click Here for 

Q_27.  मसरूर के मन्दिर हिमाचल के किस जिले में स्थित है
Ans.  काँगड़ा 



 


Q_28.  चौरासी मंदिर किस जिले में स्थित है
Ans.  भरमौर 


Q_29.  1527 में मंडी में भूतनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था
Ans.  अजबर सेन 


Q_30.  त्रिलोकीनाथ मन्दिर कहाँ स्थित है
Ans.  लाहौल स्पीती 


Q_31.  माता पार्वती के कान की गम हुई बालियों को शेषनाग ने जिस स्थान पे दुंड निकला था उस स्थान का नाम क्या है
Ans.  मनीकरण 


Q_32.  शाहतलाई का समबन्ध किस मन्दिर से है
Ans.  बाबा बालकनाथ 


Q_33.  सबसे ऊंचाई पे कौन सा मन्दिर स्थित है
Ans.  मणिमहेश 


Q_34.  किस मन्दिर में सूर्य मूर्ति विद्यमान है
Ans.  महिषासुर मन्दिर 


Q_35.  शिमला की जाखू चोटी पे किसका मंदिर है
Ans.  हनुमान 


Q_36.  ज्वाला मुखी मन्दिर की जिले में स्थित है
Ans.  काँगड़ा 


Q_37.  पंचवक्त्रा मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  मंडी 


Q_38.  बिजली महादेव मंदिर किस जिले में स्तिथ है
Ans.  कुल्लू 


Q_39.  मंडी के शासक ने 1346 ई० में पराशर मंदिर निर्मित करवाया
Ans.  बाण सेन 


Q_40.  गुरुघंटाल क्या है
Ans.  प्रसिद्ध भिक्षु आश्रम 


Q_41.  भूतनाथ मंदिर कहाँ स्थित है
Ans.  मंडी 


Q_42.  हिमाचल में सन टेम्पल कहाँ है
Ans.  निरथ 

Click Here for 

Q_43.  की' क्या है
Ans.  बौद्ध भिक्षु आश्रम 


Q_44.  हिडिम्बा मन्दिर कहाँ है
Ans.  मनाली 


Q_45.  कुल्लू जिले के किस स्थान पे मनु मंदिर स्थित है
Ans.  शाशर




Q_46.  लाहौल में मृकुला देवी मंदिर की मूर्तिकला का नमूना है
Ans.  धातु कला 


Q_47.  परशुराम मंदिर कहाँ पर स्थित है
Ans.  निरमंड 


Q_48.  हिमाचल का एलोरा किसे कहाँ स्थित है
Ans.  मसरूर 


Q_49.  श्री गोपाल मन्दिर किस स्थान पर स्थित है
Ans.  बिलासपुर 



Q_50.  कमरुनाग मन्दिर किस जिले में है
Ans.  मंडी

Social Media(Stay Updated With Us):


                                                              Advertisement With Us       

 


himexam.com

copyright@2019-2020:-himexam.com||Designed by Gaurav Patyal

Contact Form

Name

Email *

Message *

Theme images by enjoynz. Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget